चीन में खौफ से जेहादी कठमुल्ला ‘इस्लाम’ की करते है स्वयं निंदा, इस पर कोई कठमुल्ला नहीं उठाता आवाज

96
चीन में खौफ से जेहादी कठमुल्ला 'इस्लाम' की करते है स्वयं निंदा, इस पर कोई कठमुल्ला नहीं उठाता आवाज
चीन में खौफ से जेहादी कठमुल्ला 'इस्लाम' की करते है स्वयं निंदा, इस पर कोई कठमुल्ला नहीं उठाता आवाज

चीन में मुसलमानों के साथ क्या हो रहा है इसपर तो कोई कठमुल्ला आवाज नहीं उठाता। वहां पर तो किसी की गर्दन तो नहीं काटी जाती या गोली नहीं मारी जाती। कौन नहीं जानता कि चीन में मुसलमानों पर लगातार भीषण अत्याचार हो रहे हैं। चीन ने मुस्लिम बहुल शिनजियांग प्रांत में रहने वाले मुसलमानों को कस रखा है।

उन्हें खान-पान के स्तर पर वह सब कुछ मज़बूरी में करना पड़ रहा है, जो उनके धर्म में पूर्ण रूप से निषेध है। यह सब कुछ शासक कम्युनिस्ट पार्टी के इशारों पर उन्हें धर्म भ्रष्ट करने के लिये ही हो रहा है। सारी इस्लामी दुनिया इन अत्याचारों पर चुप है। कहीं कोई प्रतिक्रिया सुनाई नहीं दे रही है।

चीन में खौफ से जेहादी कठमुल्ला ‘इस्लाम’ की करते है स्वयं निंदा, इस पर कोई कठमुल्ला नहीं उठाता आवाज

इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कारपोरेशन (ओआईसी) ने चीन में मुसलमानों पर हो रही ज्यादतियों पर एक शब्द भी विरोध का दर्ज नहीं किया है। पाकिस्तान भी पूरी तरह चुप है। वो तो चीन के खिलाफ कभी भी नहीं बोलेगा। वो चीन का पूरी तरह गुलाम बन चुका है। यही स्थिति सऊदी अरब और ईरान की भी है।

शिनजियांग प्रांत के मुसलमानों को री-एजुकेशन कैंपों में ले जाकर कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से रू-ब-रू करवाया जा रहा है। इन शिविरों में अभी बताया जाता है कि दस लाख से अधिक चीनी मुसलमान हैं।

चीन में खौफ से जेहादी कठमुल्ला ‘इस्लाम’ की करते है स्वयं निंदा, इस पर कोई कठमुल्ला नहीं उठाता आवाज

चीन में जबरन अपने इस्लाम की निंदा करने के लिए कहा जाता है। इन्हें डराया-धमकाया जाता है। ऐसे आहार दिये जाते हैं जो इस्लाम में हराम माना जाता हैI यह सब कुछ इसलिए हो रहा है ताकि चीनी मुसलमान कम्युनिस्ट विचारधारा को अपना लें। वे इस्लाम की मूल शिक्षाओं से दूर हो जाएं।

गौर करें कि चीन के खिलाफ हमारे देश के वामपंथी और सेक्युलरवादी भी कभी नहीं बोलते। वैसे तो ये नमकहराम लोग भारत में रहकर भारत की जड़ों को खोदने में लगे रहते हैं। पर मजाल है कि ये कभी कठमुल्लों या फिर चीन की मुस्लिम विरोधी अभियान पर एक शब्द भी बोलें।

इनकी तब भी जुबान सिल गई थी जब भारत में ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून बन रहा था। यह तब भी नहीं मान रहे थे कि भारत में मुस्लिम औरतें की स्थिति बहुत खराब है।

फ्रांस में हत्यारों के हक में मुंबई, भोपाल और सहारनपुर में प्रदर्शन करने वाले मुसलमान कभी महंगाई, बेरोजगारी या अपने खुद के इलाकों में नए-नए स्कूल, कॉलेज या अस्पताल खुलवाने आदि की मांगों को लेकर तो कभी सड़कों पर नहीं उतरते।

क्या कोई बता सकता है कि ये अपने बुनियादी सवालों को लेकर भी कब सड़कों पर उतरेगे? क्या इनके लिए महंगाई, निरक्षरता या बेरोजगारी जैसे सवाल अब गौण हो चुके हैं? क्या कभी देश के मुसलमान किसानों, दलितों, आदिवासियों या समाज के अन्य कमजोर वर्गों के हितों के लिये भी आगे आए हैं? कभी नहीं।

पर ये उन हत्यारों के लिए सड़कों पर आ जाते हैं जो मासूमों को फ्रांस या आस्ट्रिया में मारते है। ये कभी कश्मीर में इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथों मारे गए पंडितों के लिए नहीं लड़ते। इन्हें अपने को हमेशा विक्टिम बताने का शौक है। ये सिर्फ अपने अधिकारों की बातें करते हैं। ये कर्तव्यों की चर्चा करते ही हत्थे से उखड़ जाते हैं।

जिस मुनव्वर राणा को इस देश ने दिल से प्यार दिया है, वह विक्षिप्त इंसानों की तरह से बात कर रहा है। क्यों लिबरल मुसलमान राणा को कसकर नहीं कोसते ताकि उसे एहसास तो हो कि वह कितना नीच बंदा है। राणा ने साबित कर दिया कि वह उन्मादी, असहिष्णु और कट्टर है।

वह तो घोर कट्टर, सांप्रदायिक और सामंती निकला। लेकिन मुसलमानों का बौद्धिक वर्ग उनके कहे पर चुप्पी साधे है। मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ यही समस्या है कि वे आतंकवाद को लेकर उदासीन बने रहते हैं। इसलिए पूरी मुस्लिम बिरादरी नाहक ही कटघरे में आ जाती है।