फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों बोले- ‘संकट में इस्लाम, विश्व में हर राष्ट्राध्यक्ष को इस्लामी कट्टरपंथ पर खुल कर बोलनी चाहिए  !

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फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों बोले- ‘संकट में इस्लाम, विश्व में हर राष्ट्राध्यक्ष को इस्लामी कट्टरपंथ पर खुल कर बोलनी ...
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों बोले- ‘संकट में इस्लाम, विश्व में हर राष्ट्राध्यक्ष को इस्लामी कट्टरपंथ पर खुल कर बोलनी ...

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने शनिवार को इस्लाम धर्म को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। समाचार एजेंसी AFP के मुताबिक, मैक्रों ने कहा कि इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो आज पूरे विश्व में संकट में है। उन्होंने फ्रांस में धर्मनिरपेक्षता को बचाने के लिए दिए गए एक भाषण में इस्लामी कट्टरपंथ से लड़ने की बात कही।

यह संकट सबको  दिखताहै, लेकिन कभी ‘रेडिकल इस्लाम’ तो कभी ‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’ के नाम पर छुपा दिया जाता है। वैश्विक आतंक की बात करें, या फिर मजहबी उन्माद से प्रेरित रक्तरंजित घटनाओं की, लगभग हर बार ये घटनाएँ इस्लाम के नारों, प्रतीकों, नामों या विचारों का परिणाम होती हैं। स्वयं पर बम लगा कर फटने से ले कर, लंदन के पुल पर चाकुओं से गोदने की घटना हो, या फिर ऑस्ट्रेलिया के कैफे में लोन वूल्फ अटैक से ले कर पेरिस में किसी की गर्दन रेतने की घटना, ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे और ‘हम आहत थे’ जैसी बातें हर जगह आपको मिल जाएँगी।

बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब मैक्रों ने इस्लाम धर्म को लेकर बात कही हो। इससे पहले वह इस्लाम को कट्टरता और नफरत फैलाने वाला बता चुके हैं।आपको बता दें कि फ्रांस की कुल जनसंख्या में से करीब 60-65 लाख मुस्लिम हैं। इसी साल लगभग आठ महीने पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों मे फ्रांस में विदेशी इमामों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी. उस वक्त मैक्रों ने कहा था कि सरकार ने यह फैसला कट्टरपंथ और अलगाववाद को रोकने के लिए किया है।

उनके कहने का मतलब साफ था कि फ्रांस में जो इमाम मौजूद हैं उन्हें स्थानीय भाषा सीखना जरूरी होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि फ्रांस में रहने वालों को कानून का सख्ती से पालन करना होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि इनकी वजह से देश में कट्टरपंथ और अलगाववाद का खतरा है। हम इस्लामिक कट्टरपंथ के खिलाफ हैं।

मैक्रों ने कहा कि आज पूरी दुनिया में इस्लाम संकट में है, लेकिन फ्रांस में नहीं। उन्होंने कहा कि वह दिसंबर में एक बिल पेश करेंगे, जो चर्च और सरकार को आधिकारिक रूप से अलग करेगा। उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य है कि बढ़ते इस्लामिक कट्टरपंथ को खत्म किया जाए और साथ मिलकर रहा जाए। देश को जोड़े रहने में धर्मनिरपेक्षता बेहद महत्वपूर्ण है।

किसी धर्म-रिलीजन में ऐसा मजहबी उन्माद नहीं दिखता
सामाजिक अपराध हर जगह होते हैं। आप किसी से लड़ाई कर लेते हैं, रास्ते में मार-पीट हो गई, किसी ने आपके मंदिर तोड़ दिए, कोई गाय काट देता है, ऐसी हर घटना पर आप उन्हीं व्यक्तियों को जवाब देते हैं न कि आप उसके मजहब के मानने वाली भीड़ में जा कर एक बम फोड़ आते हैं। ट्विन टावर उड़ाने का काम हो, मैनचेस्टर के स्टेडियम में बम फोड़ने का काम हो या फिर बार्सिलोना के धमाके, सीरिया को ख़िलाफ़त के नीचे लाना हो या पूरे अफ़ग़ानिस्तान को तबाह करना, किसी वैयक्तिक घटना की प्रतिक्रिया, दूसरे धर्म के लोगों या राष्ट्र को ही निशाना बनाने के उद्देश्य से की गई।

मदरसों में किस तरह की शिक्षा दी जा रही है, उसका ऑडिट होना चाहिए। वहाँ के बच्चे-बच्चियों से पूछा जाना चाहिए कि काफिरों के बारे में उनकी क्या राय है, मौलवी उन्हें हिन्दू लड़कियों के साथ क्या करने की बातें सिखाता है, क्या वह उनके साथ अश्लीलता भी करता है आदि। ये बातें जानना आवश्यक है क्योंकि अगर, फ्रांस की तर्ज पर, हर राष्ट्र ने हर बच्चे को सरकारी स्कूल (या ग़ैरसरकारी जहाँ मजहबी कट्टरता सिलेबस का हिस्सा न हो) में ही शिक्षित करना शुरु नहीं किया, तो 2060 तक विश्व की सबसे बड़ी मजहबी आबादी बन चुका इस्लाम किस रूप में अपना प्रभाव दिखाएगा वो कल्पनातीत है।

हाल ही में, असम सरकार ने कहा कि मदरसों में सरकारी पैसे नहीं दिए जाएँगे। उनका सीधा कहना था कि सरकार का काम मजहबी शिक्षा देने को बढ़ावा देना नहीं है। उसके उलट, राजस्थान में मदरसों के निर्माण, पुनरुत्थान आदि को ले कर करोड़ों रुपए जारी करने की बात की गई है। एक सेकुलर देश में सत्ता को किसी भी तरह के मजहबी कार्य का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। सांस्कृतिक कार्य अलग है, क्योंकि संस्कृति राष्ट्र की धरोहर होती है, मजहबी कार्य अलग है।