तेलंगाना में इस्लामिक शरिया को ज्यूडिशियल पावर देने की तैयारी, भारत में चल रहीं शरिया अदालतें ..?

इतना ही नहीं यह मुल्लों को इस्लाम और सख्ती से स्थापित करने का अवसर भी प्रदान करेगा। जो लोग इसका विरोध करेंगे उन्हें इस्लामी कानून के हिसाब से दंडित करने का अधिकार भी इन्हें मिल जाएगा। इसके जरिए मुल्ले इस्लाम के मध्ययुगीन कानून को फिर से लागू करने का दबाव भी बनाएँगे।

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तेलंगाना में इस्लामिक शरिया को ज्यूडिशियल पावर देने की तैयारी, भारत में चल रहीं शरिया अदालतें ..?
Photo Credit Social Media

तेलंगाना सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री कोप्पुला ईश्वर ने सभी जिलों में दारुल-कजा यानि इस्लामिक शरिया अदालत खोलने का ऐलान कर नया विवाद खड़ा कर दिया है। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत को शरिया कानूनों के अनुसार चलना चाहिए? अगर इसे तेलंगाना सरकार द्वारा अधिकृत किया गया तो इसका अन्य राज्य सरकारों द्वारा अनुसरण किया जा सकता है, जो मुस्लिम कट्टरपंथियों का समर्थन हासिल करने के लिए अपने राज्यों में इसी तरह के आदेश पारित करने के लिए इसका इस्तेमाल करेंगे। यह खुलासा ‘तेलंगाना टुडे’ की रिपोर्ट से हुआ है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) सहित कट्टरपंथी मुस्लिम लंबे समय से भारत में शरिया अदालतें स्थापित करने की माँग कर रहे हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यहाँ तक यह दावा कर चुका है कि वह देश के प्रत्येक जिले में शरिया अदालतें स्थापित करना चाहता है।

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लेकिन माइनेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पहले से ही भारत में लगभग 50 शरिया अदालतें चला रहा है। एक और मुस्लिम संगठन इमारत-ए-शरिया भी देश में ऐसे 255 कोर्ट चला रहा है।

माइनेशन की पड़ताल के मुताबिक, महाराष्ट्र में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) की 26 शरिया अदालतें हैं। खास बात यह है कि यहां संविधान के तहत चलने वाली महज 33 जिला अदालतें हैं। एआईएमपीएलबी की उत्तर प्रदेश में 13, दिल्ली में 2, मध्य प्रदेश में 2, कर्नाटक में 2 और हरियाणा में 1 शरिया अदालत है।

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असम में इमारत-ए-शरिया 80 शरिया अदालतें संचालित कर रहा है, जबकि यहां महज 21 जिला और सत्र न्यायालय हैं। बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी यह संगठन 175 शरिया अदालतें चला रहा है। अब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड देश भर में ऐसी हजारों अदालतें चाहता है।

माइनेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी दिल्ली में देश की सर्वोच्च अदालत से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर धड़ल्ले से शरिया अदालत चल रही है। वहां सुनवाई के लिए महज 300 रूपये फीस लगती है। और जज की कुसी पर बैठकर मौलाना केस सुनते है।

परंतु सवाल ये उठता है संविधान से चलने वाले देश में शरिया अदालत जैसी न्यायिक व्यवस्था चलाने की इजाजत कैसे है ?

तेलंगाना सरकार द्वारा शरिया अदालतों को वैध बनाने पर विचार करने का निर्णय खतरनाक परिणामों से भरा हुआ है। यह देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए आफत पैदा कर सकता है।

यदि इसे तेलंगाना सरकार द्वारा अधिकृत किया गया तो इसका अन्य राज्य सरकारों द्वारा अनुसरण किया जा सकता है, जो मुस्लिम कट्टरपंथियों का समर्थन हासिल करने के लिए अपने राज्यों में इसी तरह के आदेश पारित करने के लिए इसका इस्तेमाल करेंगे।

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गौर करने वाली ये बात है कि शरिया अदालतें न्यायिक अदालतों के अधिकार को कमजोर कर देंगी और देश में एक समानांतर न्यायिक प्रणाली के समान होगी।

इतना ही नहीं यह मुल्लों को इस्लाम और सख्ती से स्थापित करने का अवसर भी प्रदान करेगा। जो लोग इसका विरोध करेंगे उन्हें इस्लामी कानून के हिसाब से दंडित करने का अधिकार भी इन्हें मिल जाएगा। इसके जरिए मुल्ले इस्लाम के मध्ययुगीन कानून को फिर से लागू करने का दबाव भी बनाएँगे। जिसके परिणामस्वरूप राज्य में न्यायिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी।

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