नागरिकता संशोधन बिल क्या है ? जानिये इसके सभी पहलु

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नागरिकता संशोधन बिल क्या है ? जानिये इसके सभी पहलु
नागरिकता संशोधन कानून को लेकर कई राज्यों में बवाल मचा

नई दिल्ली । नागरिकता संशोधित कानून को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन का दौर जारी है। दिल्ली, अलीगढ़, पटना, बेंगलुरु में जोरदार प्रदर्शन चल रहा है. सवाल है कि नागरिकता कानून के किस प्रावधान पर मुस्लिम समाज प्रदर्शन कर रहा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले हिन्दुओं, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। इस दायरे से इन तीनों देशों के मुसलमानों को बाहर रखा गया है. उत्तर, पूर्व और दक्षिण भारत में इस कानून के इसी प्रवाधान को लेकर उग्र विरोध हो रहा है।

नागरिकता कानून का विरोध क्यों?
यह विधेयक प्राकृतिक रूप से नागरिकता के प्रावधान में भी छूट देता है। साथ ही विधेयक तीन देशों के छह समुदायों के लोगों को 11 साल भारत में रहने की अवधि में भी छूट देता है। विधेयक में इसे घटाकर छह साल किया गया है।
पहला विवाद तो इस बात को ही लेकर हो रहा है कि यह बिल मुस्लिमों के खिलाफ है, और दूसरी बात ये है कि आखिर धर्म के हिसाब से ये कैसे तय किया जा सकता है कि किसे नागरिकता देनी है, और किसे नहीं. विपक्षी पार्टियों और मुस्लिम संगठनों का कहना है कि ये कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन कर रहा है. यह इस कानून का सबसे विवादस्पद पहलू है. विपक्ष का कहना है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के आधार पर नागरिकता कैसे दी जा सकती है।

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भारत का नागरिकता कानून 1955
नागरिकता कानून 1955 भारतीय नागरिकता से जुड़ा एक विस्तृत कानून है. इस कानून में विस्तार से बताया गया है कि किसी शख्स को किन प्रावधानों के आधार पर भारतीय नागरिकता कैसे दी जा सकती है और भारतीय नागरिक होने के लिए क्या-क्या शर्ते हैं. इस कानून के मुताबिक किसी शख्स को चार तरह से भारत की नागरिकता दी जा सकती है। इस अधिनियम में अब तक पांच बार (1986, 1992, 2003, 2005 और 2015) बदलाव किया जा चुका है।
किसी भी व्यक्ति को भारत की नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है. लेकिन नागरिकता संशोधन कानून के जरिए पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह समयावधि 11 से घटाकर छह साल कर दी गई है। इसके लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन किए गए हैं। कानून पास होने के बाद 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत में आने वाले हिंदु, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों को नागरिकता देना का प्रावधान है।

सरकार की दलील
1947 में भारत और पाकिस्तान के धार्मिक आधार पर विभाजन का तर्क देते हुए सरकार ने कहा कि अविभाजित भारत में रहने वाले लाखों लोग भिन्न मतों को मानते हुए 1947 से पाकिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे थे। विधेयक में कहा गया है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान का संविधान उन्हें विशिष्ट धार्मिक राज्य बनाता है। परिणामस्वरूप, इन देशों में हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन और ईसाई समुदायों के बहुत से लोग धार्मिक आधार पर उत्पीड़न झेलते हैं।
यह विधेयक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई अप्रवासियों को शामिल करता है। नागरिकता कानून 1955 के अनुसार, एक अवैध अप्रवासी नागरिक को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती है। अवैध अप्रवासी का अर्थ उस व्यक्ति से है जो भारत में या तो वैध दस्तावेजों के बिना दाखिल हुआ है अथवा निर्धारित समय से अधिक भारत में रह रहा है। सरकार ने 2015 में इन तीन देशों के गैर मुस्लिम शरणार्थियों को भारत में आने देने के लिए पासपोर्ट और विदेशी एक्ट में संशोधन किया था। यदि उनके पास वैध दस्तावेज नहीं हैं तो भी वह भारत में आ सकते है।

विपक्ष का सवाल
प्रमुख विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक देश के करीब 15 फीसद मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है, जिन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया है। हालांकि सरकार ने कहा है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान मुस्लिम राष्ट्र हैं। वहां पर मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, ऐसे में उन्हें उत्पीड़न का शिकार अल्पसंख्यक नहीं माना जा सकता है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि सरकार दूसरे समुदायों की प्रार्थना पत्रों पर अलग-अलग मामले में गौर करेगी। नागरिकता संशोधन कानून 2019 संसद के दोनों से सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के मुहर के बाद कानून बना। यह भारत में अवैध रूप से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता का प्रस्ताव करता है। एनडीए सरकार के चुनावी वादों में से यह एक है। आम चुनावों के ठीक पहले यह विधेयक अपनी शुरुआती अवस्था में जनवरी 2019 में पास हुआ था। इसमें छह गैर मुस्लिम समुदार्यों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों के लिए भारतीय नागरिकता मांगी गई। इसमें नागरिकता के लिए बारह साल भारत में निवास करने की आवश्यक शर्त को कम करके सात साल किया गया। यदि नागरिकता चाहने वाले के पास कोई वैध दस्तावेज नहीं है तो भी। इस विधेयक को संयुक्त संसदीय कमेटी के पास भेजा गया था, हालांकि यह बिल पास नहीं हो सका क्योंकि यह राज्यसभा में गिर गया था।

असम में विरोध क्यों?
उत्तरपूर्वी राज्यों में विधेयक का भारी विरोध है। असम में इस बिल का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि नागरिकता संशोधन कानून असम समझौता 1985 का उल्लंघन करता है. इस समझौते के मुताबिक 24 मार्च 1971 से पहले ही दूसरे देशों से भारत आए लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है. लेकिन नए कानून के मुताबिक ये सीमा बढ़ाकर 31 दिसंबर 2014 कर दी गई है. असम समेत पूर्वोत्तर के लोगों का कहना है कि इससे बड़े पैमाने पर असम में दूसरे नस्ल के लोग आकर रहेंगे और असमिया पहचान प्रभावित होगी। यहां पर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए हैं। लोग महसूस करते हैं कि अवैध प्रवासियों के स्थायी रूप से बसने के बाद स्थानीय लोगों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। साथ ही आगामी समय में संसाधनों पर बोझ बढ़ेगा और पहले से यहां रह रहे लोगों के लिए रोजगार के अवसरों में कमी आएगी।
लोगों का एक बड़ा वर्ग और संगठन विधेयक का विरोध इसलिए भी कर रहे हैं कि यह 1985 के असम समझौते को रद कर देगा। असम समझौते के अनुसार, 24 मार्च 1971 के बाद असम में आए लोगों की पहचान कर बाहर निकाला जाए। अब नागरिकता संशोधन विधेयक में नई सीमा 2019 तय की गई है। अवैध प्रवासियों के निर्वासन की समय सीमा बढ़ाने से लोग नाराज हैं। संसदीय समिति के अनुसार, दूसरे देशों के रहने वाले इन अल्पसंख्यक समुदायों के 31 हजार 313 लोग लंबी अवधि के वीसा पर रह रहे हैं। यह लोग धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर शरण मांग रहे हैं। इंटेलीजेंस ब्यूरो के रिकॉर्ड के अनुसार, इन 31 हजार 313 लोगों में 25 हजार 447 हिंदू, 5 हजार 807 सिख, 55 ईसाई, 2 बौद्ध और 2 पारसी शामिल हैं।