UPSC सिविल सेवा परीक्षा : हिन्दी भाषियों का CSAT क्वालिफाइंग होने पर भी घट रहा है रिजल्ट

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UPSC Civil Services Examination : यूपीएससी सिविल सेवा की परीक्षा में हिन्दी भाषी राज्यों के छात्रों की स्थिति लगातार खराब हो रही है। वर्ष 2008 में हिंदी भाषियों का रिजल्ट जहां 45.1 फीसदी रहा था, वहीं वर्ष 2017 में घटकर 8.29 फीसदी रह गया। रिजल्ट में सबसे ज्यादा गिरावट सीसैट लागू होने के बाद 2011 से शुरू हुई। यूपीएससी ने वर्ष 2011 में सिलेबस में बदलाव करते हुए सीसैट लागू किया। इस बदलाव ने हिन्दी भाषी राज्यों के छात्रों के रिजल्ट की कमर ही तोड़ दी। तब पीटी 62वीं की परीक्षा में अंग्रेजी माध्यम वालों का रिजल्ट शानदार हुआ। कुल 11097 परीक्षार्थी सफल हुए, इनमें अंग्रेजी माध्यम वाले 9203 (82.9%) सफल हुए, वहीं हिन्दी माध्यम वाले परीक्षार्थियों का रिजल्ट घटकर 1682 (15.1%) पर आ गया।

इससे पहले पूर्व के वर्षों को देखा जाए तो वर्ष 2008 में 59वीं पीटी में कुल 11,279 परीक्षार्थी सफल हुए। इनमें अंग्रेजी माध्यम में सफलता प्राप्त करने वाले परीक्षार्थियों की संख्या 5817(51.6%) रही। वहीं, हिन्दी माध्यम वाले पीटी में सफल परीक्षार्थियों की संख्या 5082(45.1%) रही। वर्ष 2017 में देखा जाए तो 65वीं पीटी में 13,052 परीक्षार्थी सफल हुए। इनमें अंग्रेजी माध्यम का रिजल्ट 11,740 (91.3%) हुआ, वहीं हिन्दी माध्यम वाले परीक्षार्थी सिर्फ 1066 (8.29 %) सफल हुए।

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CSAT क्वालीफाइंग होने के बाद भी नहीं बदली स्थिति
वर्ष 2015 में यूपीएससी ने पीटी में सीसैट को सिर्फ क्वालिफाइंग विषय बना दिया। बावजूद इसके रिजल्ट में सुधार नहीं हुआ। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 2015 के रिजल्ट को देखकर समझा जा सकता है। 66वीं की परीक्षा में पीटी में 14,640 परीक्षार्थी सफल हुए। इनमें अंग्रेजी माध्यम वाले 11,819 (80.7%) परीक्षार्थी शामिल थे। वहीं हिन्दी माध्यम वालों का रिजल्ट घटकर 2439 (16.65%) हो गया। इसी तरह वर्ष 2017 में अंग्रेजी वालों का रिजल्ट बढ़कर 11740 (91.3%) हो गया और हिन्दी भाषी का रिजल्ट घटकर 1066(8.29%) हो गया।

विशेषज्ञों की राय : 
पटना विश्वविद्यालय के कुलपति डा. रासबिहारी सिंह सह भूगोलविद् ने बताया कि हिन्दी भाषी राज्यों के विश्वविद्यालयों का सिलेबस पूर्व की तरह है। इसमें बदलाव नहीं होने की वजह से हिन्दी भाषी राज्यों के छात्र पिछड़ रहे हैं। पूर्व में 12वीं तक एनसीईआरटी की पुस्तक और स्नातक अच्छे से करने वाले लड़के क्वालिफाई कर जाते थे। इसके अलावा हिन्दी भाषी राज्यों के स्कूलों की स्थिति में गिरावट एक सबसे बड़ा कारण है। वहीं, अंग्रेजी स्कूलों के पाठ्यक्रम में एक्स्ट्रा कॅरिकुलम में काफी बदलाव हुआ है। इसका लाभ अंग्रेजी वाले परीक्षार्थियों को मिलता है। हिन्दी भाषी छात्रों की सही तरीके से काउंसिलिंग नहीं हो रही है। विश्वविद्यालयों के सिलेबस को अपडेट करना बहुत जरूरी है।

वहीं प्रो. एस नारायण ने बताया कि हिन्दी भाषी राज्यों की शिक्षा में गिरावट एक सबसे बड़ा कारण है। एक समय था जब पटना विवि, इलाहाबाद विवि और बीएचयू जैसे संस्थानों से सबसे अधिक छात्र सिविल सेवा में जाते थे। उस वक्त की पढ़ाई काफी बेहतर थी। अभी की स्थिति ऐसी नहीं है। इसी तरह से हिन्दी भाषी राज्यों के आयोग का सिलेबस भी यूपीएससी की तरह बनाया जाना चाहिए ताकि परीक्षार्थी उसी तरह से तैयारी कर सकें। वहीं हिन्दी भाषी राज्यों के छात्रों के लिए उसकी भाषा में पेपर नहीं होता है।