कैसे बन गया आईआईटी का सपना बोझ

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आईआईटी से इंजीनियर बनने की चाहत इस तरह बढ़ी है कि उसकी भारी कीमत लाखों युवाओं को चुकानी पड़ रही है। हालांकि पहले ऐसा नहीं था। आज अभिभावकों की रुचि आईआईटी में इतनी बढ़ गई है  कि वे आईआईटी के अपने सपने को बच्चों पर समय से बहुत पहले थोपने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? इससे कैसे बचा जाए? इन्हीं सवालों और उनके जवाबों पर केंद्रित है वरिष्ठ पत्रकार-संपादक और आईआईटी के पूर्व छात्र संदीपन देब की रिपोर्ट…

पटना में आईआईटी इंट्रेंस कोचिंग सेंटर चलाने वाले आनंद कुमार के जीवन पर आधारित रितिक रोशन की भूमिका वाली फिल्म सुपर 30  हिट हो गई है। यह फिल्म एक अवसर है, जब हमें विगत दो दशकों से भी ज्यादा समय से लाखों परिवारों को प्रभावित कर रही गहरी गलत भावनाओं की चर्चा करनी चाहिए। भारतीय मध्यवर्ग में यह गलत धारणा व्याप्त है कि आईआईटी में चयनित होना धरती पर स्वर्ग का टिकट है। जब 1980 के दशक में हमने आईआईटी में प्रवेश लिया था, तब हमने करीब एक साल संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) की तैयारी की थी, लेकिन तब भी कुछ बहुत तेज छात्रों ने ऐसा नहीं किया था। अनेक छात्रों ने शुद्ध विज्ञान पढ़ने के लिए आईआईटी की सीट ठुकरा दी थी। शुद्ध विज्ञान उनका पहला प्यार था। कुछ छात्र ऐसे भी थे, जिन्हें जब आईआईटी में पसंद की ब्रांच नहीं मिली, तो वे अल्पज्ञात इंजीनिरिंग कॉलेज चले गए।

आज ऐसा नहीं है, आजकल अभिभावक सातवीं कक्षा या उससे पहले ही बच्चों पर आईआईटी प्रवेश परीक्षा का दबाव बनाने लगते हैं। मैं यहां सभी को छात्र कहकर ही संबोधित करूंगा। ध्यान रहे, हमारे समय में आईआईटी में छात्र-छात्रा अनुपात 25:1  था और आज 10:1 है। ज्यादातर अभिभावक यह नहीं देखते कि बच्चे की योग्यता या रुचि किसमें है। यह पागलपन बढ़त पर है, हाल ही में सवाल-जवाब के एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म क्वोरा पर मैंने एक अभिभावक का प्रश्न देखा, ‘आईआईटी जेईई की तैयारी के लिए पांचवीं कक्षा में पढ़ रहे मेरे बच्चे के लिए कौन-सा कोचिंग इंस्टीट्यूट सर्वश्रेष्ठ रहेगा?’ इस प्रश्न के बाद अभिभावक की खूब आलोचना हुई। कई लोगों का सुझाव था, बच्चों को अपने सपने देखने दीजिए, उस पर दबाव मत डालिए। उस अभिभावक ने आलोचना का जवाब भी दिया, ‘वह एक बच्चा है और अभी भला-बुरा नहीं समझता। अत: अभिभावक को ही उसके बारे में अच्छा फैसला लेना होगा। आईआईटी का तमगा बहुत सम्मानजनक होता है और यह हमारे परिवार को गौरवान्वित करेगा।’

कुछ दिन पहले एक आईआईटी प्रोफेसर से मैंने इसकी चर्चा की, तो उन्होंने कहा, आईआईटी के प्रति जुनूनी और पूर्ण स्वार्थी अभिभावकों द्वारा बच्चे के हित की अप्रिय अवहेलना आम बात है। हालांकि त्रासद विस्तार में जाने से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि आईआईटी हजारों बेहतरीन युवा स्नातक दे रहा है। कुछ अति प्रखर तकनीकी बुद्धि वाले आईआईटीयंस से मैं मिला हूं। वे छात्र के रूप में भी दुनिया भर में चल रहे अत्याधुनिक अनुसंधानों पर नजर रखते हैं, मुख्य वैज्ञानिकों के साथ संपर्क में रहते हैं और आईआईटी में उपलब्ध अतुलनीय सुविधाओं का पूरा लाभ उठाते हैं। ये पुरुष और महिला इंजीनियर आईआईटी व्यवस्था के बेहतरीन उत्पाद हैं। इसके बावजूद यहां कुछ बहुत गलत हो रहा है, एक समाज के रूप में जिसकी हमें चिंता होनी चाहिए।

सब पैसे का खेल

क्वोरा का वह अभिभावक अपने बेटे से बचपन के आनंद और किशोर भावनाएं छीन लेगा। बेटे को मनोवैज्ञानिक रूप से नुकसान पहुंचाएगा। उसके बाद वह बच्चा भले ही किसी आईआईटी में पहुंच जाए, लेकिन उस पर असर ताउम्र रहेगा और यदि वह बच्चा आईआईटी में चयनित नहीं होता है, तो विफलता का जो बोध वह ताउम्र ढोएगा, उसकी कल्पना करके देखिए।

ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि उस बच्चे के अभिभावक हर साल कुछ ऐसे आईआईटीयंस के बारे में मीडिया रिपोट्र्स पढ़ते हैं, जिन्हें अमेजन/फेसबुक या अन्य कंपनियां बहुत मोटी तनख्वाह, दो लाख डॉलर, पर अमेरिका में पदस्थापना देती हैं। ऐसे अभिभावक तत्काल डॉलर-रुपया विनिमय दर का पता करके हिसाब लगा लेते हैं और उनकी आंखें चौंधिया जाती हैं। वे यह नहीं देखते कि दोनों देशों में विक्रय शक्ति असमान है, या दो लाख डॉलर में प्रदर्शन आधारित कितने कारक शामिल हैं, जिनका भुगतान लंबे समय के दौरान किया जाएगा। उन्हें गूगल के मुख्य कार्यकारी सुंदर पिचई दिखते हैं। ऐसे सभी अभिभावक अपने सोनू बेटे में सुंदर पिचई को देखने लगते हैं।

मीडिया यह रिपोर्ट नहीं करता कि नए आईआईटी स्नातकों का औसत वेतन प्रति वर्ष 8-10 लाख रुपये ही होता है और टॉप आईआईटी में भी कम से कम 15 से 20 प्रतिशत छात्रों को कैंपस में रहते नौकरी नहीं मिलती। आईआईटी, बॉम्बे की वेबसाइट के अनुसार, 2017-18 के अकादमिक वर्ष में 85.21 प्रतिशत बी टेक छात्रों को ही कैंपस में रहते नौकरी मिली। आईआईटी, मद्रास में तो महज 73.96 प्रतिशत छात्रों को कैंपस में रहते नौकरी मिली।

कोचिंग में क्या होता है?

अगर ‘सोनू’ बेटा भाग्यशाली हुआ, तो दो साल जेईई कोचिंग जाएगा। जब वह कोचिंग में प्रवेश लेगा, तो उसे कहा जाएगा कि यदि वह अखिल भारतीय स्तर पर टॉप 500 में नहीं आया, तो वह नाकाम माना जाएगा। दस लाख से ज्यादा छात्र हर साल जेईई परीक्षा में बैठते हैं और उनमें से 12,000 ही आईआईटी में प्रवेश पाते हैं। अत: शुरुआत से ही ‘सोनू’ बेटे पर अभिभावक और कोचिंग सेंटर का दबाव होता है, तो उसे लगने लगता है कि उसकी विफलता की आशंका 99.99 प्रतिशत है। ज्यादा से ज्यादा छात्रों को उच्च रैंकिंग में लाने के लिए कोचिंग सेंटर उन पर प्रचंड दबाव डालते हैं, यह उनके व्यापार के लिए अच्छा है। कोचिंग में ‘सोनू’ को सिखाया जाता है कि बहु-विकल्प वाले फॉरमेट में कैसे सफल होना है। एक आईआईटी प्रोफेसर के अनुसार, ‘आपको सही उत्तर देना सिखाने से ज्यादा वह गलत उत्तर के बटन दबाने की आशंका घटाना सिखाते हैं, क्योंकि निर्धारित समय के अंदर सभी प्रश्नों का उत्तर देना लगभग असंभव है और गलत उत्तर पर नकारात्मक अंक मिलते हैं। कोचिंग सेंटर ज्ञान नहीं देते, वे मात्र एक परीक्षा में कामयाबी के लिए प्रशिक्षित करते हैं। ऐसे में, बच्चा बहुत कम सीख पाता है।’

खुशी और संतोष का अभाव

आईआईटी में प्रवेश के बाद एक प्रोफेसर ने करीब 90 छात्रों के एक समूह से पूछा कि आप में से कितने खुद को मिली ब्रांच और आईआईटी से खुश हैं। तो कुछ ही छात्रों ने हाथ उठाया। वे आईआईटी में आ गए हैं, लेकिन उनमें विफलता का एहसास भी आ गया है। प्रोफेसर बताते हैं, सुंदर पिचई को भी पसंद की ब्रांच और आईआईटी नहीं मिली थी। (सुंदर ने आईआईटी, खड़गपुर में मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग ब्रांच में पढ़ाई की थी)

सीखने का अभाव

पिछले दो दशकों में मैं अनेक आईआईटी में गया हूं, सैंकड़ों छात्रों से मिला हूं। आश्चर्यजनक है, उनमें से कुछ की ही इंजीनिर्यंरग में रुचि है। उनमें से कई कैंपस से भी नाखुश हैं। 1950 के दशक में आईआईटी की स्थापना के बाद से ही मध्यवर्ग के बच्चे इसमें आते रहे हैं, इसलिए नहीं कि वे इंजीनियरिंग में रुचि रखते हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें अभिभावकों से बेहतर जिंदगी का पासपोर्ट चाहिए। 25 साल पहले, जब आईटी उद्योग में उछाल नहीं आया था, तब आईआईटी में प्रवेश पाना जीवन-मरण का प्रश्न नहीं था। छात्र कैंपस की जिंदगी का पूरा आनंद लेते थे और सामान्य वयस्क के रूप में कैंपस से बाहर कदम रखते थे।

आप पिछली सदी में आईआईटी से निकले लोगों से पूछिए, तो वे कहेंगे कि आईआईटी के दिन उनकी जिंदगी के सबसे बेहतरीन दिन थे, लेकिन आज यह सच नहीं है। आईआईटी में प्रवेश लेने के बाद ‘सोनू’ पर बहुत ज्यादा दबाव है कि वह अपने अभिभावकों के ‘सुंदर पिचई-सपने’ को साकार करे। 2011 बैच में आईआईटी से निकले एक उद्यमी बताते हैं, ‘कैंपस में यदि आपको कोई उपन्यास पढ़ते देख लिया गया, तो आपको सनकी मान लिया जाएगा। लेकिन मैं मजाक नहीं कर रहा, अंतिम वर्ष के जो छात्र भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) में प्रवेश लेना चाहते हैं, उन्होंने जिंदगी में एक किताब नहीं पढ़ी है। अब उन्हें पढ़ना पड़ रहा है, क्योंकि वे जानते हैं, आईआईएम के साक्षात्कार में एक आम प्रश्न होता है, आपका प्रिय लेखक कौन है?’

अत्यधिक अकादमिक दबाव

वैसे विगत वर्षों में आईआईटी छात्रों पर अकादमिक दबाव नहीं बढ़ा है, लेकिन पहले छात्रों को अत्यधिक अभिभावकीय दबाव नहीं झेलना पड़ता था, विफलता की आशंका का ऐसा बोझ नहीं ढोना पड़ता था। एक प्रोफेसर कहते हैं, यदि इन लड़कों को एक बार ठोकर लग जाती है, तो उनमें से कई में फिर से उठने की ताकत नहीं होती। उन्हें कड़ाई से निर्देशित किया गया होता है, हमेशा चम्मच से पोषित किया गया होता है।

वर्ष 2013 में आईआईटी स्नातक होने के बाद निवेश बैंकर हुए एक युवा के अनुसार, मेरे समय में बहुत आत्महत्या और दर्जनों आत्महत्या की कोशिशें हुई थीं। मेरे एक करीबी दोस्त ने खुद को मारने की कोशिश की थी, खुद को पंखे से लटका दिया था, लेकिन न तो गर्दन टूटी और न दम घुटा। हमने उसे बचा लिया। बाद में हम चाय पी रहे थे, मजाक कर रहे थे कि वह मैकेनिकल इंजीनियरिंग में होने के बावजूद रस्सी के लचीलेपन को जान नहीं पाया, खुद को ढंग से लटका भी नहीं पाया! निस्संदेह यह मजाक भयानक है, लेकिन तब जो भी हो रहा था, उससे हम ऐसे ही निपटते थे।

तकनीकी संस्थान के कुछ तथ्य
1. 23 आईआईटी संचालित हैं देश भर में।
2. 10 लाख छात्र प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं।
3. 12 हजार छात्रों को ही प्रवेश मिलता है।
4. 08 छात्रों को पढ़ाने के लिए एक शिक्षक।
5. 30 प्रतिशत छात्र पढ़कर विदेश चले जाते हैं।
6. 24 सौ छात्र गत दो वर्ष में पढ़ाई छोड़ गए।
7. 15 छात्रों ने वर्ष 2018 में आत्महत्या की।
8. 06 छात्रों ने 2019 में अब तक की आत्महत्या।

अब होने लगे उपाय
अब समझ बढ़ी है। संस्थान छात्रों को अवसाद से बचाने के उपाय करने लगे हैं। ज्यादातर आईआईटी में अब परामर्श केंद्र हैं, जहां छात्रों को पेशेवर मदद मिल सकती है। परामर्शदाताओं के पास पूरा अनुभव होना चाहिए, तभी वे उपयोगी सिद्ध होंगे। परीक्षा से पहले के तनाव को दूर कर देने मात्र से समाधान नहीं होगा।

सीनियर बनें संरक्षक
अवसाद से बचने के लिए छात्रों की ओर से ही अगर पहल हो, तो वह ज्यादा प्रभावी होगी। सीनियर छात्र ही जूनियर छात्रों के संरक्षक बनें। जूनियर उन सीनियर से ज्यादा खुलकर बात कर सकेंगे, जो मामले को ज्यादा बेहतर समझते हैं। व्यावहारिक सलाह दे सकते हैं। सीनियर सदा साथ रहते हैं।

पाठ्यक्रम में योग
योग का संक्षिप्त पाठ्यक्रम हो। अभ्यास कराया जाए। इसे आईआईटी में अनिवार्य बनाना चाहिए, क्योंकि यदि यह अनिवार्य नहीं होगा, तो हाई ग्रेड लाने की पारंपरिक सोच हावी हो जाएगी और परिणाम शून्य हो जाएगा। आईआईटी इसके लिए अवश्य प्रयास कर सकता है।

संवाद करना सिखाएं
छात्रों को संवाद में प्रशिक्षित करना होगा। संवाद कौशल के अभाव के कारण भी कई आईआईटीयंस रोजगार पाए बिना कैंपस छोड़ जाते हैं। कंपनियां शिकायत करती हैं कि ये युवा अभ्यर्थी खुद को व्यक्त नहीं कर पाते हैं या  उनमें एक टीम के तहत काम करने के मौलिक गुणों का अभाव होता है।

सीधा संपर्क बढ़ाएं
नंदन नीलेकणि ने कहा था, ‘मैंने तमाम जन और प्रबंधन कौशल आईआईटी, बॉम्बे में रहते सीखे।’ आज हर कमरे में इंटरनेट उपलब्धता के कारण प्रत्यक्ष संपर्क कम हुआ है। पहले छात्र सतत संवाद, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों से कौशल विकसित कर लेते थे।

समझदार बनें अभिभावक
एक प्रोफेसर बताते हैं, बच्चों के आईआईटी में प्रवेश लेने के बाद से ही आईआईटी प्रोफेसर और निदेशक के पास अभिभावकों के फोन आने लगते हैं कि पढ़ाई पूरी होने के बाद वह कितने के पैकेज की उम्मीद कर सकते हैं। वास्तव में, परामर्श की जरूरत छात्रों को नहीं, उनके अभिभावकों को है। मैंने क्वोरा पर एक अभिभावक के प्रश्न से यह लेख शुरू किया था। उस अभिभावक को क्वोरा पर ही आईआईटी के दो छात्रों ने उत्तर दिया है, ‘सर, आप बहुत लेट हो गए हैं। आईआईटी र्कोंचग तो गर्भ से ही शुरू हो जानी चाहिए थी, जैसे अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदना सीखा था, पर ध्यान रहे अभिमन्यु उसी चक्रव्यूह में फंस गया था।’