पाकिस्तान PM लियाकत अली की जमीन UP सरकार के नाम  

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पाकिस्तान PM लियाकत अली की जमीन UP सरकार के नाम  
पाकिस्तान PM लियाकत अली की जमीन UP सरकार के नाम  

मुजफ्फरनगर। लियाकत अली करनाल के नवाब के बेटे थे। उन्हें संपत्ति के बंटवारे में मुजफ्फरनगर मिला। उन्होंने प्रतिष्ठित कुमायुंनी ब्राह्मण परिवार की लड़की शीला ईरीन पंत को संग-ए-हयात बनाया । ईरीन के पिता ब्रिटिश सेना के मेजर जनरल थे। नाम था हेक्टर पंत। वर्ष 1887 में उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। ईरीन की पढाई लखनऊ में हुई थी।

ईरीन पंत पढाई पूरी करने के बाद कोलकाता के किसी कॉलेज में पढाने लगीं। इसके बाद उनकी नौकरी दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में लगी। वह यहां अस्सिटेंट प्रोफेसर बन गईं। इसी दौरान लियाकत कॉलेज में भाषण देने आए। उन्होंने ईरीन को प्रभावित किया और ईरीन की बुद्धिमत्ता और सुंंदरता पर रीझ गए। यहीं से जो प्रेमकहानी शुरू हुई तो निकाह पर जाकर रुकी। वहीं लियाकत जानी-मानी शख्सियत बन चुके थे। मुस्लिम लीग के बड़े नेता। विदेश में पढकर आए हुए बैरिस्टर।

लियाकत अली ने अपनी इस बेगम के लिए मुजफ्फरनगर में आलीशान कोठी तामीर करवाई जिसका नाम कहकशां रखा, जो आज भी सुरक्षित है और उसमें एक स्कूल चलता है। बताया जाता है कि मुजफ्फरनगर के सिविल लाइंस के करीब बनी ये कोठी बाद में पुरकाजी के एक गुप्ता परिवार ने खरीद ली। अब ये उनकी संपत्ति है। ईरीन को पाकिस्तान में मादरे ए वतन का खिताब भी मिला। राजनीतिक तौर पर वह पाकिस्तान के निर्माण में सक्रिय थीं। बाद में जुल्फिकार अली भुट्टो ने उन्हें काबिना मंत्री बनाया। वह सिंध की गर्वनर भी बनीं। वर्ष 1990 में उनका निधन हुआ। अल्मोड़ा में आज भी पुराने लोग प्रखर और सुंदर शीला ईरीन को याद करते हैं।

पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री और मुजफ्फरनगर के जमींदार रहे लियाकत अली खां के परिवार की निष्क्रांत संपत्ति श्रेणी की करीब सौ बीघा बेशकीमती जमीन को लेकर एसडीएम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने जमीन को राज्य सरकार के नाम पर दर्ज करने और तहसीलदार को जमीन पर कब्जा लेने को भी कहा है।

यह फैसला भोपा रोड की शहर के अंदर की ग्राम यूसुफपुर महाल में लियाकत अली खां के चाचा रुस्तम अली खां की जमीन के लिए है। अपने निर्णय में कोर्ट ने कहा है कि महाल रुस्तम अली खां के खेवट नंबर 4/1 में लाला रघुराज स्वरूप के नाम की प्रविष्टि शिकमी काश्तकार के रूप में दर्ज थी। कुछ भूमि पर 1360 फसली से पूर्व ही लाला रघुराज स्वरूप ने अवैध तरीके से संक्रमणीय अधिकार अर्जित कर लिए थे और शेष भूमि पर अधिवासी/आसामी अधिकार जमींदारी खात्मा के दौरान वर्ष 1961 में लाला रघुराज स्वरूप को प्राप्त होने थे।

 

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